दृष्टिबाधितों के लिए शिक्षा की राह आसान करती ब्रेल लिपि

विश्व ब्रेल दिवस - दृष्टिबाधितों के लिए शिक्षा की राह आसान करती ब्रेल लिपि 
 विश्व के सभी दृष्टिबाधित जनों के लिए ब्रेल लिपि ने जीवन को सरल बनाया है। आज विश्व ब्रेल दिवस है। ब्रेल लिपि के आविष्कारक लुईस ब्रेल की स्मृति में यह दिवस मनाया जाता है। आज लुईस ब्रेल का जन्मदिन है। उभार वाले बिंदुओं की सहायता से लिखने-पढ़ने के लिए विकसित पद्धति ब्रेल लिपि कहलाती है। संयुक्त राष्ट्र संघ ने विश्व ब्रेल दिवस के लिए 6 नवंबर 2018 को प्रस्ताव पारित किया और 4 जनवरी 2019 को दुनियाभर में प्रथम विश्व ब्रेल दिवस मनाया गया। 

छह बिंदुओं पर आधारित ब्रेल लिपि 

दुनिया भर में दृष्टिबाधितों द्वारा अध्ययन के लिए प्रयोग की जा रही ब्रेल लिपि एक स्पर्शनीय पद्धति है। यह छह बिंदुओं पर आधारित है। इसमें हर अक्षर के लिए विशेष उभरे हुए बिंदु होते हैं। छह बिंदुओं की सहायता से विभिन्न वर्णों के लिए निश्चित आकृति के अक्षर बनाए जाते हैं। दिव्यांगजन उभरे संकेताक्षरों को छूकर किसी भी शब्द को पढ़ सकते हैं। वर्ष 1824 में निर्मित यह लिपि आज विश्व के अधिकांश देशों में प्रयुक्त की जाती है। ब्रेल लिपि को स्लेट पर भी प्रयोग में लाया जा सकता है। इसके अतिरिक्त इसे ब्रेल टाइपराइटर पर भी प्रस्तुत किया जा सकता है। आधुनिक ब्रेल स्क्रिप्ट को आठ बिंदुओं के सेल में विकसित  किया गया है, ताकि दिव्यांग जनों को अधिक से अधिक शब्दों को पढ़ने की सुविधा उपलब्ध हो सके। 

भारत में ब्रेल पद्धति को 1950 के बाद मिली स्वीकृति

भारत में ब्रेल लिपि को साल 1950 के बाद अपनाया गया। भारतीय भाषाओं की लिपियों को ब्रेल पद्धिति से निरुपित करने के लिए एक समान नियम व निर्देश बनाये गये और इसे भारती ब्रेल कहा गया। ग़ौरतलब है कि वर्ष 2018 में भारत सरकार ने दृष्टिबाधित नागरिकों के लिए भारतीय संविधान को ब्रेल लिपि में उपलब्ध करवाया। इसमें संविधान को पांच भागों में विभाजित कर उसे ब्रेल लिपि में लिखा गया है। वहीं, भारत का पहला ब्रेल अखबार स्वागत थोराट ने वर्ष 2008 में प्रारंभ किया। अखबार का नाम स्पर्शज्ञान है। 

महज 15 वर्ष की आयु में लुईस ब्रेल ने किया था आविष्कार 

लुईस ब्रेल ने मात्र 15 वर्ष की आयु में ब्रेल लिपि का आविष्कार किया था। लुईस ब्रेल का जन्म 4 जनवरी 1809 को फ्रांस में हुआ था। बचपन में एक दुर्घटना के बाद लुईस ब्रेल की आंखों की रोशनी चली गई। इसके बाद उनका दाख़िला रॉयल नेशनल इंस्टीट्यूट फॉर ब्लाइंड चिल्ड्रन में हुआ। वहां उन्हें फ़्रांसिसी सेना के चार्ल्स  के सैन्य संचार  प्रणाली के विषय में ज्ञात हुआ। इस प्रणाली में बारह बिंदुओं का प्रयोग किया जाता था। यह प्रणाली जटिल थी। इसके बाद लुईस ब्रेल ने अपनी लिपि पर कार्य शुरू किया और वर्ष 1824 में यह लिपि बनाकर तैयार हो गई।

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